Mirza Ghalib Shayari

 Mirza Ghalib Shayari

Mirza Ghalib Shayari

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आह को चाहिए उम्र भर तक असर होने को
जीता कौन तॆरी ज़ुल्फ कॆ सर होने तक

दाम हर मौज में है हल्का-ए-सदकामे-नहंग
क्या गुजरती है देखे कतरे पे गुहर होने तक

आशिकी सब्र तलब और तमन्ना बेताब‌
क्या रंग करूं दिल का खून-ए-जिगर होने तक

हमने माना कि तगाफुल न करोगे लेकिन‌
ख़ाक हो जाएँगे हम तुमको ख़बर होने तक

परतवे-खुर से है फ़ना की तालीम शबनम को
हूँ मैं भी एक इनायत की नज़र होने तक

यक-नज़र बेश नहीं, फुर्सते-हस्ती गाफिल
गर्मी-ए-बज्म है इक रक्स-ए-शरर होने तक

गम-ए-हस्ती का 'असद' कैसे हो जुज-मर्ग-इलाज
हर रंग में शमां जलती है सहर होने तक

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Mirza Ghalib Shayari

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क्यों बहुत पीते मेह वो बज़्म-ऐ-ग़ैर में या रब 
आज ही हुआ मंज़ूर उन को इम्तिहान अपना 

बुलंदी पर इक मंजर और हम बना सकते “ग़ालिब”
अर्श से इधर होता काश के मकान अपना

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Mirza Ghalib Shayari

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दुःख दे कर सवाल करते हो
तुम भी ग़ालिब कमाल करते हो

देख कर पूछ लिया हाल मेरा
चलो कुछ तो ख्याल करते हो

शहर-ऐ-दिल में उदासियाँ कैसी 
यह भी मुझसे सवाल करते हो

मरना चाहे तो मर नहीं सकते
तुम भी जिना मुहाल करते हो

किस - किस की मिसाल दू अब मैं तुम को
हर सितम बे-मिसाल करते हो

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Mirza Ghalib Shayari

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आए वो कभी हमारे घर में, खुदा की क़ुदरत हैं!
हम कभी उनको तो, कभी अपने घर को देखते हैं

नज़र लगे न कहीं उसके दस्त-ओ-बाज़ू को
लोग क्यूँ मेरे ज़ख़्म जिगर को देखते हैं

तेरे ज़वाहिरे तर्फ़े कुल को क्या देखें
हम औजे तअले लाल-ओ-गुहर को देखते हैं

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Mirza Ghalib Shayari

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ग़ैर लें महफ़िल में बोसे जाम के
हम रहें यूँ तिश्ना-लब पैग़ाम के

ख़स्तगी का तुम से क्या शिकवा कि ये
हथकण्डे हैं चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम के

ख़त लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो
हम तो आशिक़ हैं तुम्हारे नाम के

रात पी ज़मज़म पे मय और सुब्ह-दम
धोए धब्बे जामा-ए-एहराम के

दिल को आँखों ने फँसाया क्या मगर
ये भी हल्क़े हैं तुम्हारे दाम के

शाह के है ग़ुस्ल-ए-सेह्हत की ख़बर
देखिए कब दिन फिरें हम्माम के

इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के

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Mirza Ghalib Shayari

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आज फिर इस दिल में बेक़रारी है
सीना रोए ज़ख्म-ऐ-कारी है

फिर हुए नहीं गवाह-ऐ-इश्क़ तलब 
अश्क़-बारी का हुक्म ज़ारी है

बे-खुदा , बे-सबब नहीं , ग़ालिब
कुछ तो है जिससे पर्दादारी है

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Mirza Ghalib Shayari

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मिलती है ख़ू-ए-यार से नार इल्तेहाब में
काफ़िर होता अगर न मिलती हो राहत अज़ाब में

कब से हूँ क्या बताऊँ जहान-ए-ख़राब में
शब हाए हिज्र को भी रखूँगा हिसाब में

फिर न इंतिज़ार में नींद आए उम्र भर
जब वो आने का अहद कर गए आए जो ख़्वाब में

क़ासिद के आते आते एक और खत लिख रखूँ
मैं जानता हूँ वो जो लिखेंगे जवाब में

कब तक उनकी बज़्म मुझ में आता था दौर-ए-जाम
लगता है साक़ी ने कुछ मिला न दिया हो शराब में

लाखों लगाव एक चुराना निगाह का
लाखों बनाव एक बिगड़ना इताब में

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Mirza Ghalib Shayari

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मैं उन्हें छेड़ूँ और कुछ न कहें 
चल निकलते जो में पिए होते 

भला हो या कहर , जो कुछ हो 
काश के तुम मेरे लिए होते 

मेरी किस्मत में ग़म गर इतना था 
दिल भी या रब कई दिए होते 

आ ही जाता वो राह पर ‘ग़ालिब ’
कोई दिन और भी जिए होते
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हर बात पे कहते हो तुम कि 'तू क्या है'
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है

न करिश्मा शोले में हैं न बर्क़ में ये अदा
कोई बताओ कि वो शोखे-तुंद-ख़ू क्या है

बदन पर चिपक रहा है लहू से पैराहन
हमारी जेब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है

जिस्म जहाँ जला है वहाँ, दिल भी जल गया होगा
अब कुरेदते हो राख, जुस्तजू क्या है

रगों में दौड़ने-फिरने के हम नहीं क़ायल
जब आँखों से ही नही टपका, तो फिर लहू क्या है

वो चीज़ जिसके लिये हमको हो बहिश्त अज़ीज़
सिवाए वादा-ए-गुल्फ़ाम-ए-मुश्कबू क्या है

पियूँ शराब अगर ख़ुम भी देख लूँ दो-चार
ये शीशा-ओ-क़दह-ओ-कूज़ा-ओ-सुबू क्या है

रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी
तो किस उमीद पे कहिए कि आरज़ू क्या है

हुआ है शाह का मुसाहिब, फिरे है इतराता
वरना शहर में 'ग़ालिब; की आबरू क्या है

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इश्क़ मुझको नहीं, वहशत ही सही
मेरी वहशत तेरी शोहरत ही सही

क़त्अ कीजे, न तअल्लुक़ हम से
कुछ नहीं है, तो अदावत ही सही

मेरे होने में है क्या रुसवाई
ऐ वो मजलिस नहीं, ख़ल्वत ही सही

हम भी दुश्मन तो नहीं हैं अपने
ग़ैर को तुझसे मुहब्बत ही सही

हम कोई तर्के-वफ़ा करते हैं
ना सही इश्क़, मुसीबत ही सही

हम भी तस्लीम की ख़ू डालेंगे
बेनियाज़ी तेरी आदत ही सही

यार से छेड़ चली जाए 'असद'
गर नहीं वस्ल तो हसरत ही सही

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हमारी क़िस्मत के विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते, यही इंतजार होता

वादे पे तेरे जिये हम, तो ये जान झूठ जाना
खुशी से मर जाते, अगर 'ऐतबार' होता

तेरी नाज़ुकी से जाना के बँधा था 'एहेद-ए-बोधा'
तू ना तोड़ सकता कभी, अगर उस्तुवार होता

दिल से मेरे कोई पूछे तेरे तीर-ए-नीम कश को
कहाँ से ये ख़लिश होती, जो जिगर के पार होता

दोस्ती ये कहाँ की है के बने हैं दोस्त नासेह
कोई चारासाज़ होता, कोई गम-गुसार होता

किससे कहुँ मैं की क्या हैं शब-ए-ग़म बुरी बला हैं
क्या बुरा था मरना मुझे अगर एक बार होता

हुए जो रुसवा हम मर के, हुए क्यों ना गर्क-ए-दरिया
ना उठता कभी जनाजा, ना कहीं मज़ार होता

ये मसाइल-ए-तसव्वुफ़, ये तेरा बयान 'ग़ालिब'
तुझे हम वली समझते, जो ना बादा-ख्वार होता

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ख़ुल्द से निकलना आदम का सुनते आए हैं लेकिन
होकर बेआबरू बहुत तेरे कूंचे से हम निकले

खुल जाए भरम ज़ालिम तेरे क़ामत की दराज़ी का
अगर उस तुररा ए पुरपेचोख़म का पेचोख़म निकले

कोई उसको ख़त लिखवाए तो हम से लिखवाए
सुबह हुई और वो घर से कान पर रखकर क़लम निकले

इस दौर में हुई मनसूब मुझसे बादा आशामी
आया वो ज़माना फिर से जो जहाँ में जामेजम निकले

फ़र्क़ नहीं है मोहब्बत में जीने और मरने का
देख उसी को जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

कहाँ मैख़ाने का दरवाज़ा ग़ालिब और कहाँ वाइज़
जानते हैं इतना की कल वो जाता था के हम निकले

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दैर नहीं, हरम नहीं, दर नहीं, आस्तां नहीं
रहगुज़र पे तेरे बैठे हम, ग़ैर हमें उठाये क्यों

जब वो जमाल-ए-दिलफ़रोज़, सूरते-मेह्रे-नीमरोज़
नजारा आप ही हो तो, पर्दे में मुँह छिपाये क्यों

दश्ना-ए-ग़म्ज़ा जांसितां, नावक-ए-नाज़ बे-पनाह
तेरा ही अक्स-ए-रुख़ सही, सामने तेरे आये क्यों

उसपे हुस्न-ज़न रह गई बुल्हवस की शर्म
अपने पे एतमाद है ग़ैर को आज़माये क्यों

वां वो ग़ुरूर-ए-इज़्ज़-ओ-नाज़ यां ये हिजाब-ए-पास-वज़अ़
मिलें राह में हम कहाँ, बज़्म में वो बुलायें क्यों

हाँ वो नहीं ख़ुदापरस्त, जाओ वो बेवफ़ा सही
जो हो दीन-ओं-दिल में अज़ीज़ तो, उसकी गली में जाये क्यों

'ग़ालिब'-ए-ख़स्ता के बग़ैर कौन-से काम बन्द हैं
रोइए ज़ार-ज़ार क्या, कीजिए हाय-हाय क्यों

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दोस्त ग़म-ख़्वारी में मेरी सई फ़रमावेंगे क्या
भरते ज़ख्म तलक नाख़ुन न बढ़ जावेंगे क्या

बे-नियाज़ी हद से गुज़री बंदा-परवर कब तलक
हम कहेंगे हाल-ए-दिल और आप फ़रमावेंगे क्या

हज़रत-ए-नासेह गर आवें दीदा ओ दिल फ़र्श-ए-राह
कोई ये तो मुझे समझा दो कि समझावेंगे क्या

किया नासेह हम को क़ैद अच्छा यूँ सही
ये जुनून-ए-इश्क के अंदाज़ छुट जावेंगे क्या

ख़ाना-ज़ाद-ए-ज़ुल्फ़ हैं ज़ंजीर से भागेंगे क्यूँ
हैं गिरफ़्तार-ए-वफ़ा ज़िंदाँ से घबरावेंगे क्या

है अब इस मामूरे में क़हत-ए-ग़म-ए-उल्फ़त असद
माना कि हमने दिल्ली में रहें खावेंगे क्या

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फुर्सत-ए-कारोबार-ए-शौक किसे
ज़ौक-ए-नज़ारा-ए-ज़माल कहाँ

दिल तो दिल वो दिमाग भी ना रहा
शोर-ए-सौदा-ए-खत्त-ओ-खाल कहाँ

थी वो इक शख्स की तसव्वुर से
अब वो रानाई-ए-ख़याल कहाँ

ऐसा आसां नहीं लहू रोना
दिल में ताक़त जिगर में हाल कहाँ

हमसे छूटा किमारखाना-ए-इश्क
वाँ जो जावे गिरह में माल कहाँ

फ़िक्र-ए-दुनिया में सर खपाता हूँ
मैं कहाँ और ये बवाल कहाँ

मुज़महिल हो गए कवा ग़ालिब
वो अनासिर में एतिदाल कहाँ

बोसे में वो मुज़ाइक़ा न करे
पर मुझे ताक़ते सवाल कहा

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